(२) १५१+आध्यात्मिक सूक्तियाँ; गीता से (दूसरी किस्त)
(५१) नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। -------गीता,४/३८ अर्थ-- इस संसार मेंं ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है।
(५२) ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिं अचिरेण
अधिगच्छति। गीता,४/३९
अर्थ--ज्ञान प्राप्त करके दिव्य शान्ति
शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। (५३) नायं लोको अस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।------------गीता,४/४० अर्थ--संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।
(५४) आत्मवन्तं न कर्माणि निबन्धन्ति
धनंजय।-- गीता,४/४१
अर्थ- हे धनंजय ! आत्मपरायण को कर्म
कभी नहीं बाँधते हैं।
(५५) निर्र्द्वंद्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।-----------गीता,५/३ अर्थ-हे महाबाहो! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबंधन से मुक्त हो जाता है। (५६) योगयुक्तोमुनिर्ब्रह्म न चिरेण
अधिगच्छति।-गीता,५/६
अर्थ-भक्ति में लगा हुआ(योगयुक्तो) चिन्तक परमेश्वर को शीघ्र ही प्राप्त कर
लेता है।
(५७) योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वा
आत्म शुद्ध स। --गीता,५/११
अर्थ- योगी आसक्ति त्यागकर आत्म शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
(५८) युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिं
आप्नोति नैष्ठिकीम्। --गीता,५/११
अर्थ--भक्ति में लगा हुआ(भक्त) कर्म- फल को त्यागकर अचल शान्ति प्राप्त करता है।
(५९) कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः। ----गीता,५/२३
अर्थ-काम क्रोध से उत्पन्न वेग को जो नर सहन करने में समर्थ हो जाता है वह सुखी है।
(६०)जित आत्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। गीता,६/७
अर्थ- मन को वश में करके जिसने मन को जीत लिया है, उसने पूर्णरूप से
परमात्मा को प्राप्त कर लिया है। (६१)सुखं वा यदि वा दुखं योगी परमो मतः। ---गीता,६/३२ अर्थ--जो सुख में या दुख में सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
(६२) असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं
चलम्। --गीता,६/३५
अर्थ--हे अर्जुन ! निःसंदेह,चलायमान
मन को रोक पाना कठिन है।
(६३)नहि कल्याण कृत कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।-----गीता,६/४० अर्थ-जगत के कल्याण के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।
(६४)तपस्विभ्यौ अधिको योगीज्ञानिभ्यो अपि मतो अधिकः। ---गीता,६/४६
अर्थ--योगी, तपस्वी से, ज्ञानी से श्रेष्ठ
माना जाता है।
(६५) मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति
सिद्धये। --गीता,७/३
अर्थ--कई हज़ार मनुष्यों में कोई एक
सिद्धि को लिए प्रयत्न करता है।
(६६) सिद्धानां कश्चित्माम् वेत्ति तत्वतः।
------गीता,७/३
अर्थ--सिद्ध में से कोई एक मुझे वास्तव
में जानता है।
(६७) अहं कृत्स्रस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा। गीता,७/६
अर्थ--मैं सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और
प्रलय या कारण हूँ।
(६७)मत्तः परतरं नान्यतकिञ्चितअस्ति।
-----गीता,७/७.
अर्थ--मुझसे परे अन्य कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।
(६८) मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। -------गीता,७/७
अर्थ-- मुझमें यह सब कुछ(जो हम देखते हैं)धागे में मोती के दाने के सदृश
गुँधे हुए हैं।
(६९) रसोअहमअप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्यययोः। ---गीता, ७/८
अर्थ--हे कौन्तेय ! मैं अप्सु(जल) का स्वाद हूँ। सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ।
(७०) प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं
नृषु। -------गीता,७/८
अर्थ--(मै) वेद मंत्रों का प्रणव, खे (आकाश) का शब्द(ध्वनि),नृषु(आदमी)
का पौरुष हूँ।
(७१) गंधःपृथिव्यां च तेजश्चास्मि वि भाव से। -----गीता,७/९
अर्थ-- (मैं) पृथ्वी की गंध हूँ,और अग्नि
का तेज हूँ।
(७२) जीवनं सर्वभूतेषु तपःचअस्मि
तपस्विषु। -----गीता,७/९
अर्थ--( मैं)समस्त जीवों का जीवन तथा
तपस्वियों का तप हूँ।
( ७३) बीजं मां सर्वभूतानाम्। ----गीता,७/१०
अर्थ--मुझको सब जीवों का (आदि) बीज समझो।
(७४) बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।-गीता,७/१०
अर्थ--(मैं) बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ।
(७५)तेजस्तेजस्विनामहम्।-गीता,७/१०
अर्थ--मैं तेजस्वी पुरुषों का तेज (हूँ )।
(७६) बलं बलवतां चाहं कामराग
विवर्जितम्।-- गीता,७/११
अर्थ--मै काम-राग से रहित बलवानों का बल हूँ।
(७७) दैवी ह्येषा गुणमयी मम् माया दुरत्यया। -----गीता,७/१४ अर्थ--अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया दुस्तर है। (७८) मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। -गीता,७/१४ अर्थ--जो मुझको ही निरन्तर भजते हैं,वे इस माया को पार कर जाते हैं। (७९)आर्तो जिज्ञासु: अर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ। ----------गीता,७/१६ अर्थ-हे भारत! (मुझे) आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी (भजते हैं।)
(८०) बहूनां जन्मना मन्ते ज्ञानवान्मां
प्रपद्यते। ---गीता,७/१९
अर्थ--अनेक जन्म-मृत्यु चक्र के अंत में
ज्ञानी मेरी शरण ग्रहण करता है।
(८१) कामैस्तैस्तैर्हृत ज्ञानाः प्रपद्यन्ते
अन्यदेवताः। ------गीता,७/२०
अर्थ--जिनका ज्ञान कामनाओं द्वारा हृत
(हरण) कर लिया गया है, वे अन्य देवताओं के शरण में जाते हैं।
(८२)अछरं ब्रह्मपरमंस्वभावोअध्यात्मम् उच्यते। -----गीता,८/३
अर्थ--अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है। (८३) अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।--------गीता,८/५ अर्थ--जो अंतकाल में भी मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है(वह) मुझे ही प्राप्त करता है।
(८४) यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते
कलेवरम्। ----गीता,८/६
अर्थ--शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस
जिस भाव का स्मरण करता है (वह) उसी को प्राप्त करता है।
(८५) प्रयाण काले मनसः अचलेन।
------गीता८/१०
अर्थ-मृत्यु के समय मन को स्थिर करना चाहिए।
(८६) यत अछरं वेद वेदो वदन्ति। --------गीता,८/११
अर्थ--वेदों के ज्ञाता ओंकार का उच्चारण
करते हैं।
(८७) विशन्ति यद्यतयो वीतरागः।
-----गीता,८/११
अर्थ--सन्यास आश्रम के बड़े-बड़े मुनि
ब्रह्म में प्रवेश करते हैं।
(८८) मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न
विद्यते -----गीता,८/१६
अर्थ--हे अर्जुन !जो मुझे प्राप्त कर लेता
है, वह फिर कभी जन्म नहीं लेता।
(८९) सहस्त्र युग पर्यन्त अहः यत ब्रह्मणः विदु। --- गीता,८/१७
अर्थ--एक हज़ार युग मिलकर ब्रह्मा का
एक दिन बनता है।
(९०) रात्रिम् युग सहस्र अन्ताम् ते अहो-
रात्र विैदो जनाः। ---गीता,८/१७
अर्थ--और इतनी ही बड़ी ब्रह्मा की रात्रि
भी होती है।
(९१) अव्यक्तात व्यक्तयः सर्वाःप्रभवन्ति अहः आगमे। -----गीता,८/१८
अर्थ--ब्रह्मा के दिन के प्रारम्भ में अव्यक्त
जीव व्यक्त हो जाते हैं।
(९२) रात्रि आगमे प्रलीयन्ते तत्र एव
अव्यक्त संज्ञके। -----गीता,८/१८
अर्थ-- रात्रि आने पर अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं।
(९३) भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा
प्रलीयते। ----गीता,८/१९
अर्थ--समस्त जीव बार-बार जन्म लेकर
विनष्ट हो जाते हैं।
(९४) रात्रि आगमे अवशः पार्थ प्रभवति
अहः आगमे।
अर्थ--हे अर्जुन !रात्रि के आने पर समस्त
जीव विलीन हो जाते है, दिन होने पर
प्रकट हो जाते हैं।
(९५) मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तिना। ------गीता,९/४
अर्थ--यह सम्पूर्ण जगत मेरे अव्यक्त
रूप द्वारा व्याप्त है। (९६)सर्व भूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।---------गीता,९/७ अर्थ-हे कौन्तेय!(कल्प के अंत में) सभी जीव मेरी ही प्रकृति में प्रवेश करते हैं। (९७)तेषां नित्याभि युक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् -------गीता,९/२२ अर्थ-उन नित्य निरंतर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का योग-क्षेम मैं स्वयं ले लेता हूँ। (९८) ये भजन्ति तुमां भक्त्यांं मयि ते तेषुु चाप्यहम्।-----गीता,९/२९ अर्थ-जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं,वे मुझमें हैं,और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ। (९९)समोअहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यो अस्ति न प्रियः।--------------गीता,९/२९ अर्थ--मैं सब भूतों में समभाव से व्याप्त हूँँ , न मेरा कोई अप्रिय है, न प्रिय। (१००)कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति। ----------गीता,९/३१ अर्थ--हे कौन्तेय! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
(१०१) न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न
महर्षयः। -------गीता,१०/२
अर्थ--न तो देवतागण मेरे ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षि गण।
(१०२)अहम् आदिः हि देवानां महर्षीणां
च सर्वशः। -----गीता,१०/२
अर्थ--मैं सभी प्रकार से देवताओं और
महर्षियों के भी उद्गम का कारण हूँ।
(१०३)महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारःमनवः
तथा। -----गीता,१०/६
अर्थ- सप्तॠषिगण तथा उनसे भी पूर्व
चारअन्य महर्षि(सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार) एवं सारे मनु(स्वायम्भु,
स्वरोचिष,औत्तमी,तामस,रेवत,चाछुष
वैववस्त,सावर्णि,दछ,ब्रह्म,धर्म,रुद्र,रौच्य
या देव,भौतिक या इंद्र) सब मेरे मन से उत्पन्न हैं।
(१०४) मद्भावा मानसा जाता एषां लोक
इमः प्रजः। -------गीता,१०/६
अर्थ-- विभिन्न लोकों में निवास करने वाले सारे जीव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
(१०५) अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं
प्रवर्तते। -------गीता,१०/८
अर्थ--मैं सबके उत्पत्ति का कारण हूँ।
सभी वस्तुएँ मुझसे ही उत्पन्न हैं।
(१०६) कथं विद्यामहं योगिन् त्वाम् सदा
परिचिन्तयन्। ------गीता,१०/१७
अर्थ--हे परम योगी कृष्ण ! मैं कैसे आपको जान सकूँ ? मैं कैसे आपका
चिन्तन करूँ ?
(१०७) केषु केषु च भावेषु चिन्त्यः असि
भगवन् मया। -----गीता,१०/१७
अर्थ--हे भगवन्।आपका चिन्तन किस- किस रूप में किया जाय।
(१०८) अहंं आत्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः।---गीता,१०/२० अर्थ- हे अर्जुन ! मैं सब भूतों में स्थित सबका आत्मा हूँ।
(१०९) अहम् आदिः च मध्यम् च भूता-
नाम् अन्तः एव च। --गीता,१०/२०
अर्थ--मैं ही समस्त जीवों का आदि,मध्य और अन्त हूँ। (११०) अश्वत्थःसर्ववक्षाणम् । -----गीता,१०/२६ अर्थ-मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँँ। (१११)त्वमादि देवः पुरुषः पुराणः।- ------गीता,११/३८ अर्थ--आप आदि देव और सनातन पुरुष हैं।
(११२) त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। --------गीता,११/३८ अर्थ- आप इस जगत के परम आश्रय है।
(११३) वेत्तासि वेद्यं च परं च धामम्।
------गीता,११/३८ अर्थ-आप जानने वालों के लिए जानने योग्य और परम धाम हैं। (११४) त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम्। ---गीता,११/३८ अर्थ:-हे अनंतरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त है । (११५) निर्वैरः सर्वभुतेषु यः स मामेति पाणडव। ------गीता,११/५५ अर्थ--हे अर्जुन !जो सम्पूर्ण भूत प्राणियों में वैर से रहित है , वह मुझको ही प्राप्त होता है। (११६)यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ---------गीता,१२/१७ अर्थ-जो न हँसता है,न शोक रखता है ,न सोचता है, न कामना करता है (वह मुझे प्रिय है)। (११७) शुभाशुभ परित्यागी भक्ति मान्यः स मे प्रियः।--गीता,१२/१७ अर्थ-जो शुभ अशुभ कर्मो का त्यागी है ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। (११८)समः शत्रो च मित्रे च तथा मान अपमानयो। ---गीता,१२/१८ अर्थ--जो शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में सम रहता है।(वह मुझे प्रिय है)। (११९) शीतोष्ण सुख दुःखेषु समः संग विवर्जिताः। ----गीता,१२/१८ अर्थ- (जो) सर्दी गर्मी में , सुख दुःख आदि द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति से रहित है,(वह मुझे प्रिय है)।
(१२०) अध्यात्म ज्ञान नित्यत्वं तत्व ज्ञनार्थ दर्शनम्।----गीता,१३/११ अर्थ-अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति,तत्व के अर्थ रूप में परमात्मा का दर्शन करना, ज्ञान है। (१२१) सत्वात्संजायते ज्ञानम्।-- ----------गीता,१४/१७
अर्थ--सत्व गुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। (१२२) उर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था। -----_--गीता,१४/१८
अर्थ-सत्व गुण वाले स्वर्ग लोक जाते हैं। (१२३) मध्ये तिष्ठति राजसः।---- --------गीता,१४/१८ अर्थ-रजोगुणी मनुष्य लोक को प्राप्त होते हैं। (१२४) अधो गच्छन्ति तामसः।- -----------गीता,१४/१८
अर्थ-तामसी कूकर ,शूकर ,कीट, पतंग होते हैं।
(१२५) द्वन्द्वैर्विमुक्ता सुख दुख संज्ञैः
गच्छन्त्यमूढ़ा पदमअव्ययं तत्।
-----गीता,१५/५
अर्थ--जो सुख तथा दुख के द्वन्द्व से मुक्त हैं और जो मोह रहित होकर परम पुरुष
के शरणागत होना जानते हैं, वे उस शाश्वत राज्य को प्राप्त करते हैं।
(१२६) न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न
पावकः। --- गीता,१५/६
अर्थ--वह (परमधाम) न तो सूर्य या चन्द्र
द्वारा प्रकाशित है और न अग्नि से।
(१२७) तद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम्। -------गीता,१५/६
अर्थ-- जो लोग वहाँ पहुँच जाते हैं वे कभी नहीं लौटते।
(१२८) ममैवांशो जीव लोके जीव भूतः
सनातनः। ----गीता,१५/७
अर्थ--इस लोक को समस्त जीव मेरे
शाश्वत अंश हैं।
(१२९)गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यह
मोजसा। ------गीता,१५/१३
अर्थ--मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ,
और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थिर रहते हैं।
(१३०) अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनांदेहम्
आश्रितः। ----गीता,१५/१४
अर्थ-मैं समस्त जीवों केशरीरों में वैश्वानर
(पाचक अग्नि के रूप में) हूँ।
(१३१) प्राणापानसमायुक्तःपचाम्यन्नं
चतुर्विधम्। ------गीता,१५/१४
अर्थ:-मैं श्वास-प्रश्वास में रहकर चार प्रकार (पेय, भोज्य, लेह्य, चोष्य) के अन्नों को पचाता हूँ।
(१३२) सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो।
-----गीता,१५/१५
अर्थ-मैं समस्त प्राणियों के हृदयमें स्थित
हूँ।
(१३३) मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
-----गीता,१५/१५
अर्थ- -मुझमें ही स्मृति,ज्ञानऔर अपोहन
(विस्मृति) होती है।
(१३४) वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो।
-----गीता,१५/१५
अर्थ-मै ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ।
(१३५) वेदान्तकृत् वेदवित्एव चाहम्।
-----गीता,१५/१५
अर्थ--मैं ही वेदान्त का संकलन कर्ता, और वेदों का ज्ञाता हूँ।
(१३६) द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरः च अक्ष पररः एव च। ------गीता,१५/१६
अर्थ--इस संसार में दो प्रकार के पुरुष, क्षर(सामान्य पुरुष) और अक्षर (महापुरष) हैं।
(१३७)क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते। ----गीता,१५/१६
अर्थ:- समस्त जीवों को क्षर तथा कूटस्थ
(महापुरुष) को अक्षर कहते हैं ।
(१३८) लोकत्रयम् आविश्य विभर्ति
अव्यय ईश्वरः। ----गीता,१५/१७
अर्थ-- अविनाशी ईश्वर. तीनोलोकों में
प्रवेश करके समस्त जीवों का पालन
करता है।
(१३९)यस्मात क्षरंअतीतोअहम् अक्षरात
अपि च उत्तमः। --- गीता,१५/१८
अर्थ-- चूँकि क्षर,अक्षर से भी मैं दिव्य और श्रेष्ठ हूँ।
(१४०) अतोअस्मि लोके वेदे च प्रथितः
पुरुषोत्तमः। ----गीता,१५/१८
अर्थ--अतएव मैं इस जगत में तथा वेदों में परमपुरुष के रूप में विख्यात हूँ।
(१४१)दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मतः। ---- गीता,१६/५
अर्थ--दैवीय(दिव्य) गुण मोक्ष के लिए हैं, आसुरी गुण बन्धन केलिए माने जाते हैं।
(१४२) प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। ---गीता,१६/७
अर्थ-- आसुरी गुण के लोग नहीं जानते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
(१४३)सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति
भारत। -----गीता, १७/३
अर्थ-- हे अर्जुन ! सब की अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार श्रद्धा होती है।
(१४४) श्रद्धामयोअयं पुरुषो यो यत्
श्रद्धः स एव सः। ---- गीता,१७/३
अर्थ--अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से
युक्त कहा जाता है।
(१४५) यजन्ते सात्विका देवान्यक्ष
रक्षांस राजसः। ----- गीता,१७/४
अर्थ--सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को,
रजोगुणी यक्षों और राक्षसों को पूजते हैं।
(१४६) प्रेतान्भूत गणान् च अन्ये यजन्ते
तामसा जनाः। ---गीता,१७/४
अर्थ--तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को
पूजते हैं।
(१४७) आहारःतु अपि सर्वस्य त्रिविधो
भवति प्रियः। ---गीता,१७/७
अर्थ--प्रत्येक व्यक्ति जो भोजन पसंद करता है, वह भी गुणों को अनुसार तीन
प्रकार का होता है।
(१४८) आयुः सत्व बल आरोग्य सुख
प्रीति विवर्धनः। ----गीता,१७/८
अर्थ--(सात्विक भोजन) आयु बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला, बल,स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति प्रदान करने वाला होता है।
(१४९) न हि देह भृता शक्यं त्यक्तुं कर्माणि अशेषतः। --गीता,१८/११ अर्थ--निःसंदेह किसी भी देहधारी प्राणी
के लिए समस्त कर्मों का परित्याग कर
पाना असंभव है।
(१५०) ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न
कांक्षति। -------गीता,१८/५४
अर्थ--ब्रह्म से तदाकार होकर प्रसन्न आत्मा न कभी खेद करता है, न कभी
इच्छा करता है।
(१५१) समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते
पराम्। ----गीता,१८/५४
अर्थ- वह सब जीवों से सम भाव रखता है, और मेरी दिव्य भक्ति प्राप्त करता है।
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