१५१+ आध्यात्मिक सूक्तियाँ; गीता से (पहली किस्त)
१-स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम
माधव। गीता,१/३६
अर्थ--हे माधव !अपने ही कुटुम्बियों को मारकर हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं ?
२--कुलछये प्रणश्यन्ति कुल धर्माः सनातनाः। गीता,१/३९
अर्थ- कुल का नाश होने पर सनातन कुल परम्परा नष्ट हो जाती है। ३--नासतो विद्यते भाावो न भावो विद्यते सतः।--गीता,२/१६ अर्थ-- असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है, सत् वस्तु का अभाव नहीं है। ४--नायं हन्ति न हन्यते।-गीता,२/१९ अर्थ-- यह(आत्मा) न तो मारता है, न मारा जाता है। ५-- न जायते म्रियते। गीता,२/२०
अर्थ--(आत्मा) न जन्मता है, न मरता है। ६-- न हन्यते हन्यमाने शरीरे। ---------गीता,२/२०
अर्थ- शरीर के मारे जाने पर वह (आत्मा) मारा नहीं जाता। ७--संयाति नवानि देही।--गीता,२/२२ अर्थ--(आत्मा) नये शरीर को धारण करता है। ८--नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।--गीता,२/२३ अर्थ-(आत्मा) को न शस्त्र काट सकते हैं न आग जला सकती है। ९-- अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्यो ऽयमुच्यते --गीता २/२५ अर्थ- कहा जाता है यह (आत्मा) अव्यक्त है, अचिंत्य है ,अविकारी है। १०-जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः।गीता,२/२७
अर्थ--जिसने जन्म लिया है, उसकी
मृत्यु निश्चित है। ११--ध्रुवं जन्म मृतस्य च।गीता,२/२७
अर्थ--और मरने वाले का जन्म निश्चित है। १२--देही नित्यमवध्योअयम्।
----गीता,२/३०
अर्थ--यह आत्मा नित्य अवध्य है। १३-स्थित प्रज्ञस्य का भाषा?-- ----- गीता,२/५४ अर्थ - स्थित प्रज्ञ कौन है? १४-वशे हि यस्य इन्द्रयाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता -गीता;२/२६
अर्थ--जो अपने इन्द्रियों को वश में कर लेता है वह स्थिति प्रज्ञ है। १५- सुखे-दुखे समेकृत्वा लाभा-लाभो, जया-जयो।-गीता,२/२८ अर्थ-सुख-दुख,लाभ-हानि,जय-पराजय में समान रहकर कर्म करो। १६-- कर्मण्येधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।--------गीता,२/४७
अर्थ-कर्म करने का ही अधिकार है उसके फलों पर कभी नहीं।
१७--बुद्धि युक्तो जहातीहा।गीता,२/५० अर्थ--भक्ति से युक्त व्यक्ति इसी जीवन में (अच्छे और बुरे कर्मों से) मुक्त हो जाता है।
१८--वशे हि यस्यइन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता। ---गीता,२/६१
अर्थ--जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, उसकी
चेतना (मुझमें) स्थिर हो जाती हैं। १९-ध्यायतोविषयानपुंसःसंगस्तेषु पजायते। ------गीता,२/६२
अर्थ-विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्त हो जाती है। २०-संगात संजायते कामः।गीता,२/६२ अर्थ- चिंतन से काम (कामना) उत्पन्न होता है। २१-कामात्क्रोधो अभिजायते।- --------गीता,२/६२ अर्थ-कामना की पूर्ति न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। २२- क्रोधाद् भवति सम्मोहः। -----गीता,२/६३ अर्थ-क्रोध से मूढ़़भाव उत्पन्न होता है। २३-सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः।
-----गीता,२/६३ अर्थ-मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम उत्पन्न होता है। २४-स्मृति भ्रंशाद् बुद्धिनाशो। ----- गीता,२/६३ अर्थ-स्मृति में भ्रम उत्पन्न होने से बुद्धि (ज्ञान) का नाश हो जाता है। २५-बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।-गीता,२/६३ अर्थ-बुद्धि का नाश होने से पुरुष का नाश हो जाता है(पतन हो जाता है)। २६-अशान्तस्य कुतः सुखम्?-- ------गीता,२/६६ अर्थ-अशान्त को सुख कहाँ? २७- या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।--गीता,२/६९
अर्थ--जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह संयमी के लिए जागने का समय है।
२८-शान्तिं आप्नोति न काम कामी। ----गीता,२/७०
अर्थ--कामनाओं को पूरा करने के इच्छुक को शान्ति नहीं मिलती है। २९-नहि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्य कर्मकृत। --गीता,३/५ अर्थ-कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता। ३०- कर्मेन्द्रियैैः कर्मयोगमसक्तः स
विशिष्यते। गीता,३/७
अर्थ-- जो कर्म योगी बिना आसक्ति के कर्म इन्द्रियों से कर्म करता है, वह उत्कृष्ट है। ३१- नियतं कुरु कर्मत्वं। गीता,३/८
अर्थ- तुम अपना नियत कर्म करो।
३२- यज्ञार्थात्कर्मणो अन्यत्र लोकोअयं
कर्मबंधनः। गीता ३/९
अर्थ-यज्ञरूप में(ईश्वरीय कार्यसमझकर)
कर्म करना चाहिए, अन्यथा इस जगत में कर्म के कारण बंधन होता है।
३३- अन्नाद्भवन्ति भूतानि। गीता,३/१४
अर्थ- समस्त प्राणी अन्न पर आश्रित हैं।
३४- ब्रह्माछर समुद्भवम्। गीता,३/१५
अर्थ- ब्रह्म(वेद) अछर(परब्रह्म) से उत्पन्न हुआ।
३५- आत्मनेेव च संतुष्टः तस्य कार्य न विद्यते।--गीता,३/१७ अर्थ--जो (मनुष्य) आत्मा में ही संतुष्ट है उसके लिए कोई कार्य नहींं। ३६- असक्तो ह्याचरन्कर्म परमआप्नोति पूरुषः।-- गीता,३/१९ अर्थ--आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होजाता है। ३७- प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।--गीता,३/२७ अर्थ-सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं। ३८- अहंकार विममूढात्मा कर्ता अहम् इति मन्यते।--गीता,३/२७ अर्थ--अहंकारी विमूढ़ात्मा 'मैै कर्ता हूँ ' ऐसा मानता है। ३९- गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।--गीता,३/२८ अर्थ- -गुणा(इंद्रियाँ) गुणेषु(तृप्ति) में ही बरत रहे हैं, ऐसा समझकर (तात्विक) आसक्त नहीं होता है। ४०- स्वधर्मे निधनं श्रेयः।-गीता,३/३५ अर्थ-अपने धर्म पर मरना भी श्रेयस्कर है। ४१- पर धर्मो भयावहः।-गीता,३/३५ अर्थ-दूसरों का धर्म भय देने वाला होता है।
४२- अथ केन प्रयुक्तो अयं पापं चरति पूरुषः ? -गीता,३/३६
अर्थ- तब किसके द्वारा पुरुष (न चाहते हुए भी)पाप कर्म में प्रयुक्त होता है ?
४३- काम एष क्रोध एष रजोगुण
समुद्भवः। गीता,३/३७
अर्थ- इसका कारण रजोगुण से उत्पन्न
काम और बाद में क्रोध है। ४४-पापमानं प्रजहिह्येनं ज्ञान-विज्ञान नाशनम्। ---गीता३/४१ अर्थ-ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को तू मार डाल। ४५-जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्। ---गीता,३/४३ अर्थ--हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल। ४६-धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। ----गीता,४/८
अर्थ:-धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।
४७-जन्म कर्म च मे दिव्यम्।-गीता,४/९ अर्थ--मेरा जन्म और कर्म दिव्य है। ४८-ये यथामां प्रपद्यन्ते तांस्थैव भजाम्यहम्। --गीता,४/११ - अर्थ- जो (भक्त) मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मै भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ।
४९- छिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्म जा। गीता,४/१२
अर्थ- इस संसार में मनुष्यों को सकाम
कर्म का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है। ५०-न मांं कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। --- गीता४/१४ अर्थ-कर्म के फल मेंं मेरी स्पृहा नहीं है (इसलिए) कर्म मुझे लिप्त नहीं करते।
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