ईश्वर का रहस्य---(दसम ग्रन्थ पर आधारित)
ईश्वर का रहस्य---(दसम ग्रन्थ पर आधारित)
ब्रम्हचर्य के अनुपालन से, ईश्वर नहीं मिला करता ।हिजड़ा अपने आयुकाल में , सदा कुँवारा ही रहता । १। नंगे रहने से भी ईश्वर , नहीं कभी मिल सकता है।बंदर सदैव नंगा रहकर , विचरण करता रहता है।२। खाक़ रमाने से ईश्वर को , नहीं प्राप्त कर सकते हैं। खाक़ लगाकर गदही गदहा , यूँ ही घूमा करते हैं।३। मरघट में साधन से जन को , मोक्ष नहीं है मिल सकता। मोक्ष नहीं पा सका आज तक, निशि दिन गिद्ध वहीं रहता। ४। मठ में रहने वाला साधू , मोक्ष नहीं पा सकता है। मुक्त नहीं हो पाया उल्लू, सदैव मठ में रहता है।५। मुक्ति नहीं मिल सकती उनको, जो उदास मन रखते हैं । उदासीन मृग वन में यूँ ही, विचरण करते रहते हैं ।६। मौन साधने से भी ईश्वर, नहीं संत को मिल सकता। कर न सका तरु प्राप्त ईश को, मौनी बन कर यह रहता।७। कछुआ,मछली,तेन्दुआ को भी, नारायण ही कहते हैं। नारायण को जप कर कैसे? प्रभु से हम मिल सकते हैं।८। अगर गगन में मिलता ईश्वर, चिड़िया नभ में रहती हैं। जलने से यदि मिलता ईश्वर, पाँखी अक्सर जलती हैं।९। प्रभो नाम के जपने से ही, नर को मुक्ति नहीं मिलती। करती रहती जाप पूदना, तुही तुही सदैव कहती।१०। ओबी लेने से साधू ,भव पार नहीं कर सकता है। साँप गुफा में रहता है,पर नहीं कभी वह तरता है।११। कामी,क्रोधी,ज्ञानहीन जन, पार नहीं भव कर सकते। कैसे होंगे पार ? हमेशा स्त्री वश में ये रहते।१२। पालक है जो अखिल विश्व का, विलग जगत से रहता है। दीं दयाल वह, जगत पाल वह, नहीं जगत में फँसता है।१३। नहीं ईश का ज्ञान जिसे,वह जग में आता रहता है। ईश्वर को नर बिना ज्ञान के, नहीं कभी पा सकता है।१४। घायल प्राणी निजी व्यथा से, निशिदिन हैं रोते रहते। अस्तु तपी तन घायल करके, कैसे प्रभु को पा सकते?१५। शोर मचाते फिरते कितने? कितने रोकर मर जाते? डूबे नर पानी में कितने? कितने जलकर मर जाते?१६। कछुआ मछली कितने हैं?कुछ जीव इन्हें निपटायेंगे। अच्छ, वच्छ होकर सपच्छ,ये दूर कहीं उड़ जायेंगे१७। इस समुद्र,इस धरा,गगन को नहीं सदा रह पाना है। चाँद,सितारे सबको इकदिन, काल ग्रास बन जाना है।१८। ईश एक मंदिर- मस्जिद का, भजन उसी का सब करते। मानव की है जाति एक,पर भ्रमित व्यर्थ मेंं सब रहते।१९। असुर,देव,गंधर्व,तुर्क, सुर, हिन्दू के हैं भेष अलग। भिन्न भिन्न क्षेत्रों में रहते, हैं स्वभाव इसलिये विलग।२०। भेष रहित अल्लाह एक है, पुरां कुरां में है प्रस्तुति। उसने हमें बनाया,हम सब करते उसकी हैंं स्तुति।२१। हिन्दू ,तुर्क, शिया, सुन्नी से, एक भाव हम रखते हैं। मानव की इक जाति सभी की, सबको एक समझते हैं।२२। सृष्टि बनायी है उसने,वह पालक और दयालू है। देता सबको रिज़्क वही,हम सबका वही कृपालु है।२३। वह सबका है गुरू,हमेशा उसकी पूजा भजन करें। वही ज्योति सबके अंदर है, सदैव उसका मनन करें।२४। मिट्टी से जो बना धूल कण, दूर गगन तक उड़ता है। पुनः लौटकर आता भू पर, फिर मिट्टी में मिलता है।२५। उठती रहतीं लहरें नद में, और छोर तक जाती हैं। नद में ही ये बनती लहरें, नद ही ये कहलाती हैं।२६। इसी तरह से एक ईश ही, हर प्राणी का उद्गाता। प्राणी अपना कार्य पूर्ण कर, पुनः उसी में मिल जाता।२७। तेज समाता ज्यों अतेज में, फिर अतेज का हुआ विलय। प्रभु से त्यों सब पैदा होते, और उसी में होते लय।२८। ------------------------------ ------------------ --------
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