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(74) सूर्योपनिषद

सूर्योपनिषद-- सूर्योपनिषद (सूर्योपनिषत्) अथर्ववेद से सम्बद्ध एक लघु उपनिषद है। इसमें सूर्य को ब्रह्मस्वरूप, आत्मस्वरूप तथा समस्त जगत् के आधार के रूप में निरूपित किया गया है। इसका पाठ सूर्योपासना, आदित्य-तत्त्व और आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। ॥ सूर्योपनिषत् ॥ मंगलाचरण ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ अर्थ: हे देवगण! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और अपनी आँखों से कल्याणकारी दृश्य देखें। स्वस्थ और दृढ़ अंगों से आपकी स्तुति करते हुए, जितनी आयु हमें प्राप्त हुई है, उतनी आयु तक देवहित के कार्यों में लगे रहें। इन्द्र हमारा कल्याण करें, सर्वज्ञ पूषा हमारा कल्याण करें, गरुड़ हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। १. सूर्य-उपासना का स्वरूप हरिः ॐ। अथ सूर्याथर्वाङ्गिरसं व्याख्यास्यामः। ब्रह्मा ऋषिः। गायत्री छन्दः। आदित्यो देवता। हंसः...

(75) अक्षि उपनिषद

अक्षि उपनिषद,-- अक्ष्युपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध लघु उपनिषद् है। इसका मुख्य विषय पहले भाग में चाक्षुष्मती-विद्या और सूर्योपासना, तथा दूसरे भाग में ब्रह्मविद्या, योग और आत्मज्ञान है। परंपरागत पाठ में यह दो खण्डों में मिलता है। नीचे मैं मूल संस्कृत पाठ के साथ हिन्दी अर्थ क्रम से दे रहा हूँ। ॥ अक्ष्युपनिषत्।। मंगलाचरण यत्सप्तभूमिकाविद्यावेद्यानन्दकलेवरम् । विकलेवरकैवल्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥ अर्थ: जो सात भूमिकाओं के ज्ञान से जानने योग्य आनन्दस्वरूप हैं और देह से परे कैवल्यस्वरूप हैं, उन श्रीरामचन्द्र के चरणों का मैं भजन करता हूँ। ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हरिः ॐ ॥ प्रथम खण्ड — चाक्षुष्मती-विद्या अथ ह सांकृतिर्भगवानादित्यलोकं जगाम  तमादित्यं नत्वा चाक्षुष्मतीविद्यया तमस्तुवत् । अर्थ: तदनन्तर भगवान् सांकृति आदित्यलोक में गए। उन्होंने भगवान् सूर्य को प्रणाम करके चाक्षुष्मती-विद्या द्वारा उनकी स्तुति की। सूर्य-स्तुति ॐ नमो भगवते श्रीसूर्यायाक्षितेजसे नमः । ॐ खेचराय नमः । ॐ महासेनाय नमः । ॐ तमसे नमः ...

(76) अध्यात्मोपनिषद

अध्यात्मोपनिषद-- अध्यात्मोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध एक वेदान्तप्रधान उपनिषद् है। इसमें आत्मा, ब्रह्म, माया, अध्यास, आत्मज्ञान, समाधि और जीवन्मुक्ति का विवेचन है। उपलब्ध पाठ में आरम्भिक मन्त्रों के बाद ६९ क्रमांकित श्लोक तथा अन्त में उपदेश-परम्परा दी गई है। ॥ अध्यात्मोपनिषत् ॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ हरिः ॐ॥ १-- अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यमस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे सञ्चरन् यं पृथिवी न वेद। यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे सञ्चरन् यमापो न विदुः। यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरे सञ्चरन् यं तेजो न वेद। यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे सञ्चरन् यं वायुर्न वेद। यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे सञ्चरन् यमाकाशो न वेद। यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरे सञ्चरन् यं मनो न वेद। यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे सञ्चरन् यं बुद्धिर्न वेद। यस्याहंकारः शरीरं योऽहंकारमन्तरे सञ्चरन् यमहंकारो न वेद। यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे सञ्चरन् यं चित्तं न वेद। यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे सञ्चरन् यमव्यक्तं न वेद। यस्य...

(77) वराहोपनिषद--

वराहोपनिषद --- वराहोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध एक योग-वेदान्तप्रधान उपनिषद् है। इसमें भगवान् वराह और ऋषि के संवाद के माध्यम से ब्रह्मज्ञान, आत्मतत्त्व, योग, ध्यान, प्राणायाम और मोक्ष का वर्णन मिलता ह वराहोपनिषद् में पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय — आत्मज्ञान और ब्रह्मतत्त्व द्वितीय अध्याय — योग और मन की साधना तृतीय अध्याय — प्राणायाम, प्रत्याहार आदि योग विधियाँ चतुर्थ अध्याय — आत्मा, ब्रह्म और अद्वैतज्ञान पञ्चम अध्याय — मोक्ष, जीवन्मुक्ति और परमज्ञान प्रथम कध्याय--  वराहोपनिषद् के प्रथम अध्याय में भगवान् वराह और महर्षि ऋभु का संवाद है। इस अध्याय में मुख्यतः २४, ३६ और ९६ तत्त्वों की गणना, जीव की अवस्थाएँ तथा आत्मज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है। उपलब्ध संस्कृत पाठ में प्रथम अध्याय १७ मंत्रों में समाप्त होता है।   प्रथम अध्याय का  मूल संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ-- हरिः ॐ। अथ ऋभुर्वै महामुनिर्देवमानेन द्वादशवत्सरं तपश्चचार। तदवसाने वराहरूपी भगवान्प्रादुरभूत्। स होवाचोत्तिष्ठोत्तिष्ठ वरं वृणीश्वेति। सोदतिष्ठत्। तस्मै नमस्कृत्योवाच—भगवन्! कामिभिर्यद्यत्कामितं...