(1) संवर्ग विद्या-----
संवर्ग विद्या--एक जानश्रुत नाम का राजा था। उसे पौत्रायण भी कहते हैं। सम्भव है उसके पिता और उसके पिता के पिता अर्थात् दादा जी जीवित रहे हों इसलिए राजा को पौत्रायण कहा गया हो। राजा बहुत उदार था। वह गरीबों की भलाई में ही अपना सारा समय खर्च करता था। जगह- जगह उसने सराय बनवा रखी थी जहाँ से वह गरीबों के लिए भोजन बनवा कर वितरित किया करता था। उसकी ख्याति देवलोक तक पहुँची हुयी थी। एक दिन वह रात्रि में अपनी महल की छत पर लेटा हुआ था।आकाश मार्ग से दो हंस उड़ते हुए जा रहे थे। पीछे वाले ने आगे वाले हंस से कहा, ऐ भलाक्ष ! कहीं ऐसा तो नहीं कि आप उस मार्ग से होकर चल रहे हों जिधर राजा जानश्रुत का महल है ? उधर से मत चलना। उसकी भलाई की ऊर्जा देवलोक तक पहुँच रही है। कहीं ऐसा न हो कि उसकी ऊर्जा से निकलने वाले प्रबल ताप से हमारे पंख जल जाएँ। भलाक्ष ने उत्तर दिया, यह राजा तो इतना तुच्छ है, इसके किस गुण पर रीझकर तुम इतनी प्रसंशा करते हो ? क्या तुम इसे गाड़ी वाले रैक्व ऋषि के समान समझ रहे हो ? असम्भव ! उस ऋषि के पास भलाई करने वाले सभी महापुरुषों का भलाई के बदले मिलने वाला फल पहुँचता रहता है(समाविष्ट होता रहता है) ? ठीक वैसे ही जैसे कृत (सतयुग) नाम वाले पाासे की जीत होने पर उससे निम्न श्रेणी वाले त्रेता, द्वापर और कलि नाम के सभी पासे उसी में समाविष्ट हो जाते हैं। पहले हंस ने पूछा, वह रैक्व ऋषि कौन सी विद्या जानता है, जिससे वह इतना महान् है ? भलाक्ष ने कहा, वह ऐसी विद्या जानता है जिसके जान लेने पर प्रत्येक व्यक्ति उसी के समान शक्ति शाली हो जाता है। राजहंसों का वार्तालाप सुनकर राजा चिन्ता में पड़ गया और रैक्व ऋषि से मिलने का संकल्प लिया। प्रातः जब उसकी कीर्ति का बखान करके कवि गण जगाने पहुँचे तो राजा ने उन से पूछा ! क्या मेरी कीर्ति गाड़ी वाले रैक्व ऋषि के समान है ? यह बात दरबार में फैली। कर्मचारी गाड़ी वाले रैक्व ऋषि की खोज में इधर-उधर फैल गए। सायं काल जब कर्मचारी दरबार में खाली हाथ पहुँचे तब राजा ने कहा, उस महान् पुरुष को झोपड़ियों में ढूँढो। नदी के तटों पर खोजो। कर्मचारी पुनः गाड़ीवाले रैक्व ऋषि की खोज में निकल पड़े। खोजते- खोजते कर्मचरियों का एक दल एक गाँव में पहुँचा। गाँव के बाहर एक गाड़ीवान को देखा ! जो गाड़ी के नीचे बैठकर मैले- कुचैले कपड़े पहने हुए अपनी दाद को खुजला रहा था। एक कर्मचारी ने निकट जाकर पूछा ! क्या आप ही रैक्व ऋषि हैं ? उसने उत्तर दिया ! हाँ ! मैं ही हूँ। कर्मचारी दल वापस राजा के पास आया और वस्तु स्थिति की जानकारी दी। राजा प्रातः छः सौ गायों, एक स्वर्ण हार और घोड़ों से जुता हुआ एक रथ लाकर देते हुए कहा, यह सब आपके लिए है। आप मुझे वह ज्ञान दें जो आपके पास है और जिसके कारण भलाई करने वालों का फल आपको मिलता रहता है। रैक्व ऋषि ने डाँटते हुए कहा, हे शूद्र (मूर्ख) ! तू वापस चला जा और अपनी दी हुयी सारी वस्तुओं को वापस ले जा। राजा वापस अपने महल में चला आया। उसे उस ज्ञान की चाहत थी, जो ज्ञान रैक्व ऋषि के पास था। राजा पुनः दूसरे दिन एक हज़ार गाय, रत्नों के कई हार, घोड़ो से जुता हुआ रथ और अपनी सुन्दर पुत्री को लेकर रैक्व ऋषि के पास गया। रैक्व ऋषि से कहा कि यह सब आपके लिए है। राजा की पुत्री को देखकर ऋषि द्रवित हो गए और संवर्ग विद्या का ज्ञान देने को तैयार हो गए, उन्हें लगा कि राजा ईमानदारी से ज्ञान अर्जित करना चाहता है। रैक्व ऋषि ने जो ज्ञान राजा जानश्रुत को दिया, उस संवर्ग विद्या का ज्ञान नीचे वर्णित है---
संवर्ग का अर्थ होता है अवशोषित करना। समाविष्ट कर लेना।
वायुः वाव संवर्गः। यदा वा अग्निः उदवयति वायुं एवपयेति। यदा सूर्यो अस्तम् एति वायुं एवपयेति।यदा चन्द्रोअस्तम् एति वायुं एवपयेति।
--छान्दोग्य उपनिषद: 4/3/1--2
भावार्थ---इस अखिल ब्रह्माण्ड में वायु ही संवर्ग है। अग्नि जलकर जब बुझती है तो उसका ताप और प्रकाश वायु द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। (रात में हम प्रकाश के लिए दीपक जलाते हैं और प्रातः होते ही हम दीपक को बुझा देते हैं। अब प्रश्न उठता है कि दीपक की लौ कहाँ चली गयी तो इसका उत्तर है कि दीपक की लौ वायु द्वारा अवशोषित कर ली गयी)। सूखने पर जल वायु द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। सूर्य जब अस्त होता है (किसी गोलार्ध में ) तब वहा का उसका ताप और प्रकाश वायु द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। चन्द्र जब अस्त होता है तो उसकी शीतलता तथा प्रकाश वायु द्वारा अवशोषित कर ली जाती है और वायु से अग्नि, जल, सूर्य, चन्द्र आदि एक नियम के अनुसार प्रकट भी होते रहते है। यह नित्य प्रक्रिया है, निरन्तर चलती रहती है और अन्त में अर्थात् प्रलय काल में समस्त अग्नि, समस्त जल, सूर्य, चन्द्र आदि समस्त ग्रह सहित अखिल ब्रह्माण्ड वायु द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है)।
अथद्यतम प्राणों वाव संवर्गः। स यदा स्वपिति प्राणमेव वाग्प्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोतं प्राणं मनः प्राणों ह्ये वैतां सर्वं सं वृं कृते इति।
छान्दोग्य उपनिषद:4/3/3
भावार्थ--पिण्ड (शरीर) में प्राण ही संवर्ग है। वाणी (बोलने की सामर्थ्य), चक्षु (देखने की सामर्थ्य), श्रवण (सुनने की सामर्थ्य) मन (सोचने की सामर्थ्य) आदि सभी इंद्रियों की सामर्थ्य प्राण द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। व्यक्ति जब सोता है और सुसुप्ति अवस्था में आता है तो उसकी वाणी, चक्षु, श्रवण और मन प्राण नें समाहित हो जाते है केवल श्वास (सांस) चलता है।
प्रलय काल में यह वायु (ईश्वरीय शक्ति माया) और प्राण (ईश्वरीय शक्ति जीव) ईश्वर द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। सृष्टि काल में ईश्वर से वायु (माया) और प्राण (जीव) बाहर आ जाते हैं। वायु से अग्नि, जल, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह बाहर पुनः अपनी कक्षा में आकर संचालित होने लगते हैं।
और जीव विभिन्न पिण्डों में आकर इन्द्रियों (वाणी, चक्षु, श्रवण और मन आदि) के द्वारा पिण्डों को संचालित करने लगते हैं।
तौ वा एतौ द्वौ संवर्गो वायुः एव देवेसु प्राणः प्राणेषु।--छान्दोग्य उप: 4/3/4
भावार्थ--इस प्रकार दो संवर्गों (तत्वों) वायु और प्राण के द्वारा यह समस्त ब्रह्माण्ड संचालित है। रैक्व ऋषि ने राजा जानश्रुत से कहा, मैं उस ईश्वर का ध्यान करता हूँ जो देवताओं में वायु और पिण्डों में जीव को अपने में (अवशोषित) समाहित कर लेता है। इसप्रकार रैक्व ऋषि ने राजा जानश्रुत को संवर्ग विद्या की शिक्षा दी।
रैक्व पर्ण नाम का स्थान आज भी विद्यमान है जहाँ पर राजा जानश्रुत को रैक्व ऋषि ने शिक्षा दी थी।
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